“मितव्ययिता की सलाह” देने वाली सरकारों से जवाबदेही का बड़ा सवाल

आज पूरी दुनिया एक अनिश्चित दौर से गुजर रही है।मध्य-पूर्व के खाड़ी देशों में बढ़ते युद्ध जैसे हालात, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक टकराव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक आर्थिक मंदी और डॉलर के मुकाबले कई देशों की कमजोर होती अर्थव्यवस्थाओं ने आम आदमी का जीवन मुश्किल बना दिया है।पेट्रोल, डीजल, CNG, LPG गैस, खाद्य तेल, दवाइयाँ, परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुएँ लगातार महंगी होती जा रही हैं।

दुनिया के कई देशों के नेता आज अपनी जनता को “कम खर्च में जीवन जीने”, “बचत करने” और “जरूरत भर ही उपयोग करने” की सलाह दे रहे हैं।भारत में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि

क्या सरकारों ने भविष्य में आने वाले ऐसे वैश्विक संकटों के लिए पहले से कोई मजबूत और दीर्घकालिक योजना बनाई थी?

या फिर पूरा ध्यान केवल चुनाव जीतने वाले लोकलुभावन वादों और मुफ्त योजनाओं पर ही केंद्रित रहा?

वर्षों से केंद्र और राज्य सरकारें चुनावों के समय जनता को मुफ्त योजनाओं, सब्सिडी, नकद सहायता और अलग-अलग प्रकार के प्रलोभनों के जरिए आकर्षित करती रही हैं।मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन, मुफ्त यात्रा, भत्ते और अन्य घोषणाएँ राजनीतिक हथियार बनती गईं।लेकिन जब वैश्विक आर्थिक संकट सामने आया, तब वही सरकारें जनता को मितव्ययिता का पाठ पढ़ाने लगीं।

सवाल यह नहीं है कि गरीबों की मदद क्यों की जा रही है।सवाल यह है कि —क्या देश की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर और मजबूत बनाने के बजाय मुफ्त योजनाओं पर आधारित राजनीति को ज्यादा प्राथमिकता दी गई?आज देश के लगभग 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन योजना के अंतर्गत अनाज ले रहे हैं।यह आँकड़ा खुद देश की आर्थिक और सामाजिक वास्तविकता को उजागर करता है।यदि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करने वाला देश अपनी आधी से अधिक आबादी को मुफ्त अनाज पर निर्भर रखता है, तो यह गर्व का विषय है या चिंता का?

और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति को मिलने वाला पाँच किलो राशन पूरे महीने दो वक्त का भोजन चलाने के लिए पर्याप्त है? रसोई गैस, तेल, दाल, सब्जी, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के बीच केवल अनाज देकर गरीबी समाप्त नहीं की जा सकती।जनता को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए रोजगार चाहिए, स्थिर आय चाहिए और महंगाई पर नियंत्रण चाहिए।आज बेरोजगारी देश की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बन चुकी है।डिग्रियाँ लेने के बाद भी लाखों युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं।सरकारी भर्तियों में देरी, पेपर लीक घोटाले, कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था और निजीकरण की नीतियों ने युवाओं के भविष्य को असुरक्षित बना दिया है।जब रोजगार पर सवाल उठते हैं, तब आंकड़ों का खेल दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही नजर आती है।किसान भी भारी संकट से गुजर रहे हैं।डीजल महंगा, खाद महंगी, बिजली महंगी और फसलों के उचित दाम नहीं — इन परिस्थितियों में किसान कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है।एक तरफ देश को कृषि प्रधान कहा जाता है और दूसरी तरफ किसानों को अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है।आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है।एक तरफ अमीरों की संपत्ति तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ मध्यम वर्ग EMI, शिक्षा, इलाज और महंगाई के बोझ से दबता जा रहा है।मध्यम वर्ग आज सबसे ज्यादा पिस रहा है — टैक्स भी वही देता है और राहत भी उसे सबसे कम मिलती है।मीडिया और राजनीति की भूमिका भी अब सवालों के घेरे में है।जनता के असली मुद्दे — महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और भ्रष्टाचार — पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन अक्सर टीवी डिबेट केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाती हैं।कोई डॉलर को जिम्मेदार ठहराता है, कोई युद्ध को, कोई पिछली सरकारों को दोष देता है और कोई विपक्ष को असफल बताता है।लेकिन आम आदमी के जीवन में क्या सुधार हुआ? यह सवाल आज भी कायम है।देश को केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि दूरदर्शी आर्थिक नीति की जरूरत है।ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा, कृषि सुधार, पारदर्शी नीतियाँ, भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई और रोजगार सृजन पर केंद्रित योजनाएँ ही देश को मजबूत बना सकती हैं।सिर्फ भाषणों और प्रचार से समस्याओं का समाधान नहीं होगा।अब समय आ गया है कि जनता भी केवल नारों और टीवी बहसों से आगे बढ़कर असली सवाल पूछे —

देश की आर्थिक तैयारी क्या है?

युवाओं के लिए रोजगार कहाँ है?

महंगाई कब नियंत्रित होगी?

गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने की नीति क्या है?

और सबसे महत्वपूर्ण — क्या विकास वास्तव में आम आदमी तक पहुँचा है?

क्योंकि किसी भी देश की वास्तविक प्रगति ऊँची इमारतों, बड़े आयोजनों या राजनीतिक प्रचार से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आए सुधार से मापी जाती है।

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