आलेखन – संगीता चौधरी-(सूचना ब्यूरो, तापी) : 4 फरवरी को पूरे विश्व में ‘विश्व कैंसर दिवस’ मनाया गया। जब पूरी दुनिया इस जानलेवा बीमारी के खिलाफ जागरूकता और संघर्ष की बात कर रही है, तब तापी जिले के किसानों ने एक कदम आगे बढ़कर लोगों की थाली तक शुद्ध और विषमुक्त भोजन पहुंचाने का संकल्प लिया है। इसके परिणामस्वरूप तापी जिले के 15,690 किसान आज केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि सही मायनों में ‘स्वास्थ्यदाता’ बनकर उभर रहे हैं।

प्राकृतिक खेती अब जनभागीदारी से जनआंदोलन का रूप ले रही है।तापी जिले में राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं और मार्गदर्शन के अंतर्गत प्राकृतिक खेती का विस्तार लगातार हो रहा है। तीन माह पूर्व राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रतजी ने तापी जिले की यात्रा के दौरान माणेकपुर गांव के प्राकृतिक खेती के अग्रणी किसान रतीलालभाई रेवजीभाई वसावा के फार्म की मुलाकात ली थी और उनके समर्पण एवं कार्य की सराहना की थी।राज्यपालश्री द्वारा प्राकृतिक खेती को लगातार प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

इन प्रयासों के फलस्वरूप जिले में रतीलाल वसावा जैसे कुल 15,690 किसानों ने 7,687 एकड़ क्षेत्र में रसायन मुक्त खेती अर्थात प्राकृतिक कृषि को अपनाया है।देशी गाय निर्वाह खर्च योजना के अंतर्गत अब तक 1,455 किसानों को ₹78.57 लाख की सहायता राशि प्रदान की गई है।

पिछले चार वर्षों में जिले के कुल 99,258 किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दिया गया है, जिनमें से केवल चालू वर्ष में ही 18,072 किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं।जिले में NMNF तथा गुजरात प्राकृतिक कृषि विकास बोर्ड के अंतर्गत कुल 102 क्लस्टर कार्यरत हैं, जो किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सोनगढ़ तालुका के सिंगपुर गांव की पंजीकृत महिला मंडली प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार में अग्रणी भूमिका निभा रही है।किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके, इसके लिए जिला एवं तालुका स्तर पर कुल 7 बिक्री केंद्र कार्यरत हैं। इसके अलावा वालोड तथा निज़र-कुकरमुंडा में कार्यरत 2 FPO के माध्यम से किसान ऑनलाइन बिक्री भी कर रहे हैं, जिससे अब तक ₹47.78 लाख से अधिक की आय अर्जित की गई है।उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक खेती से उत्पादित अनाज रसायन और कीटनाशक मुक्त होने के कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे कैंसर जैसे गंभीर रोगों का खतरा कम हो जाता है। साथ ही प्राकृतिक खेती भूमि, जल और पर्यावरण की भी रक्षा करती है। स्वस्थ समाज से विकसित भारत की संकल्पना को साकार करने तथा कैंसर मुक्त भारत के निर्माण हेतु प्राकृतिक खेती आज समय की मांग बन चुकी है।
