सुबीर तालुका के बिबुपाड़ा गांव के प्रगतिशील किसान गमनभाई ठाकरे का प्राकृतिक खेती का अनोखा मॉडलचना, मक्का, गेहूं और सूरजमुखी की मिश्रित फसल से तैयार किया मॉडल फार्मसुबीर तालुका के सात गांवों में मास्टर ट्रेनर बनकर किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए कर रहे प्रेरित।

विशेष रिपोर्ट : उमेश गावित
(डांग सूचना ब्यूरो)
आहवा, ता. 02 :

प्राकृतिक खेती आज किसानों के लिए प्रेरणा का मजबूत स्तंभ बनकर उभर रही है। यह खेती पद्धति न केवल भूमि की उर्वरता को बनाए रखती है, बल्कि किसानों के आत्मविश्वास को भी नई ऊर्जा प्रदान कर रही है। डांग जिले को प्राकृतिक जिला घोषित किए जाने के बाद यहां के किसान बड़े पैमाने पर प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं।सरकार द्वारा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने हेतु राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग (NMNF) के अंतर्गत विभिन्न योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं। जिले में प्राकृतिक खेती के विस्तार हेतु क्लस्टर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जा रहा है।डांग जिले के पूर्वी पट्टी क्षेत्र के बिबुपाड़ा गांव के प्रगतिशील किसान गमनभाई ठाकरे ने प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने खेत में पारंपरिक खेती के साथ-साथ मिश्रित फसल पद्धति को अपनाया है।

प्राकृतिक खेती के महत्व को समझते हुए वे अन्य किसानों को भी इस पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और आज एक प्रेरणास्रोत बन चुके हैं।गमनभाई ठाकरे ने बताया कि पूर्व में वे रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग करते थे, जिससे भूमि की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था। इसी कारण उन्होंने प्राकृतिक खेती की ओर रुख किया। उन्होंने अपने खेत में जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, अग्निअस्त्र, ब्रह्मास्त्र, वर्मी कम्पोस्ट तथा देशी गाय आधारित जैविक घोलों का उपयोग शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी में नमी बढ़ी, भूमि नरम व भुरभुरी बनी, सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि हुई तथा केंचुओं की संख्या बढ़ने से भूमि की उर्वरता में उल्लेखनीय सुधार हुआ।आत्मा परियोजना से जुड़कर प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लेने के बाद ठाकरे ने प्रेरणा यात्राएं कीं, मॉडल फार्म का अवलोकन किया तथा राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रतजी के मार्गदर्शन में पूर्णतः प्राकृतिक खेती अपनाने का निर्णय लिया। वर्तमान में वे मास्टर ट्रेनर के रूप में सुबीर तालुका के सात गांवों में किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं और इसके सिद्धांतों की जानकारी देकर खेती का दायरा बढ़ा रहे हैं। गमनभाई ठाकरे अपने खेत में चना, मक्का, गेहूं, सूरजमुखी, लहसुन और प्याज की मिश्रित खेती कर रहे हैं। रासायनिक खाद व कीटनाशकों का पूर्ण त्याग करने के बाद फसल की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है, भूमि की सेहत सुधरी है, जीरो बजट फार्मिंग संभव हुई है तथा बाजार में बेहतर मूल्य भी प्राप्त हो रहा है।गुजरात में प्राकृतिक खेती के विकास में राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रतजी की निरंतर प्रेरणा और मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी पहल के बाद राज्यभर में प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है।डांग जिले के एस्पिरेशनल तालुका सुबीर के किसान भी इस प्राकृतिक खेती अभियान में पीछे नहीं हैं। गमनभाई ठाकरे जैसे किसानों के प्रयासों से डांग जिले में प्राकृतिक खेती की दिशा में सकारात्मक और तेज बदलाव देखने को मिल रहा है।जिले के किसानों के सामूहिक प्रयासों से भूमि की उर्वरता बढ़ रही है, रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा मिल रहा है, जैविक घोलों का उपयोग बढ़ रहा है और टिकाऊ व स्वस्थ कृषि प्रणाली की ओर मजबूत कदम बढ़ रहे हैं। इसके चलते डांग जिले में प्राकृतिक कृषि क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। *विशेष : ** मिश्रित फसल पद्धति के लिए उपयुक्त सहजीवी फसलें* : –जीरो बजट देशी गाय आधारित प्राकृतिक खेती में मिश्रित फसल पद्धति के लिए सहजीवी फसलों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है।यदि मुख्य फसल एकदल (एकबीजपत्री) हो तो सहजीवी फसल द्विदल (द्विबीजपत्री) होनी चाहिए।मुख्य फसल की जड़ें गहरी जाती हों तो सहजीवी फसल की जड़ें उथली होनी चाहिए।सहजीवी फसल मुख्य फसल की तुलना में आधे या एक-तिहाई समय में तैयार होनी चाहिए।सहजीवी फसल तेजी से बढ़ने वाली और भूमि को ढकने वाली होनी चाहिए।यदि मुख्य फसल के पत्ते तेज धूप सहन करते हों तो सहजीवी फसल कम धूप सहन करने वाली हो।यदि मुख्य फसल के पत्ते कम गिरते हों तो सहजीवी फसल अधिक पत्ते गिराने वाली हो।सहजीवी फसल ऐसी हो जिसमें मित्र कीट आकर्षित हों, जिससे मुख्य फसल में कीट नियंत्रण स्वाभाविक रूप से हो सके।


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